Thursday, September 13, 2018

गणपति अथर्वशीर्ष का हिन्दी अनुवाद सहित पाठ Ganpati Arthvasheersha with hindi translation

     || गणपति अथर्वशीर्ष का हिन्दी अनुवाद सहित पाठ ||


।।     श्री गणपति अथर्वशीर्ष पाठ     ।।

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽ सि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम् ।।१।।

अर्थ- ॐकारापति भगवान गणपति को नमस्कार है। हे गणेश तुम्ही प्रत्यक्ष तत्व हो। तुम्ही केवल कर्ता हो। तुम्ही केवल धर्ता हो। तुम्हीं केवल हर्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्ही इन सब रूपों में विराजमान ब्रह्म हो। तुम साक्षात नित्य आत्मस्वरूप हो।

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।२।।

मैं ऋत न्याययुक्त बात कहता हूं। सत्य कहता हूं।

अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात् ।।३।।

हे पार्वतीनंदन तुम मेरी (मुझ शिष्य की) रक्षा करो। वक्ता (आचार्य) की रक्षा करो। श्रोता की रक्षा करो। दाता की रक्षा करो। धाता की रक्षा करो। व्याख्या करने वाले आचार्य की रक्षा करो। शिष्य की रक्षा करो। पश्चिम से रक्षा। पूर्व से रक्षा करो। उत्तर से रक्षा करो। दक्षिण से रक्षा करो। ऊपर से रक्षा करो। नीचे से रक्षा करो। सब ओर से मेरी रक्षा करो। चारों ओर से मेरी रक्षा करो।

त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽषि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माषि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽषि ।।४।।

तुम वाङ्‍मय हो, चिन्मय हो। तुम आनंदमय हो। तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानंद अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम दानमय विज्ञानमय हो।

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिकाकूपदानि ।।५।।

यह जगत तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत तुममें लय को प्राप्त होगा। इस सारे जगत की तुममें प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। परा, पश्चंती, बैखरी और मध्यमा वाणी के ये विभाग तुम्हीं हो।

त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम् ।।६।।

तुम सत्व, रज और तम तीनों गुणों से परे हो। तुम जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं से परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म औ वर्तमान तीनों देहों से परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों से परे हो। तुम मूलाधार चक्र में नित्य स्थित रहते हो। इच्छा, क्रिया और ज्ञान तीन प्रकार की शक्तियाँ तुम्हीं हो। तुम्हारा योगीजन नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चंद्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू:, र्भूव:, स्व: ये तीनों लोक तथा ॐकार वाच्य पर ब्रह्म भी तुम हो।

गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सँ हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम: ।।७।।

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गण के आदि अर्थात ‘ग्’ कर पहले उच्चारण करें। उसके बाद वर्णों के आदि अर्थात ‘अ’ उच्चारण करें। उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है। इस प्रकार अर्धचंद्र से सुशोभित ‘गं’ ॐकार से अवरुद्ध होने पर तुम्हारे बीज मंत्र का स्वरूप (ॐ गं) है। गकार इसका पूर्वरूप है।बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संधान है। संहिता संविध है। ऐसी यह गणेश विद्या है। इस महामंत्र के गणक ऋषि हैं। निचृंग्दाय छंद है श्री मद्महागणपति देवता हैं। वह महामंत्र है- ॐ गं गणपतये नम:।

एकदंताय विद्‍महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात ।।८।।

एक दंत को हम जानते हैं। वक्रतुण्ड का हम ध्यान करते हैं। वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करें। यह गणेश गायत्री है।

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर: ।।९।।

एकदंत चतुर्भज चारों हाथों में पाक्ष, अंकुश, अभय और वरदान की मुद्रा धारण किए तथा मूषक चिह्न की ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लंबोदर वाले सूप जैसे बड़े-बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर प रक्त चंदन का लेप किए हुए रक्तपुष्पों से भलिभाँति पूजित। भक्त पर अनुकम्पा करने वाले देवता, जगत के कारण अच्युत, सृष्टि के आदि में आविर्भूत प्रकृति और पुरुष से परे श्रीगणेशजी का जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सब योगियों में श्रेष्ठ है।

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम: ।।१०।।

व्रात (देव समूह) के नायक को नमस्कार। गणपति को नमस्कार। प्रथमपति (शिवजी के गणों के अधिनायक) के लिए नमस्कार। लंबोदर को, एकदंत को, शिवजी के पुत्र को तथा श्रीवरदमूर्ति को नमस्कार-नमस्कार ।।10।।

एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।
स सर्वत: सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते ।।११।।

यह अथर्वशीर्ष (अथर्ववेद का उप‍‍‍निषद) है। इसका पाठ जो करता है, ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है। सब प्रकार के विघ्न उसके लिए बाधक नहीं होते। वह सब जगह सुख पाता है। वह पांचों प्रकार के महान पातकों तथा उपपातकों से मुक्त हो जाता है।

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति ।।१२।।

सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश करता है। प्रात:काल पाठ करने वाला रात्रि के पापों का नाश करता है। जो प्रात:- सायं दोनों समय इस पाठ का प्रयोग करता है वह निष्पाप हो जाता है। वह सर्वत्र विघ्नों का नाश करता है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ।।१३।।
इस अथर्वशीर्ष को जो शिष्य न हो उसे नहीं देना चाहिए। जो मोह के कारण देता है वह पातकी हो जाता है। सहस्र (हजार) बार पाठ करने से जिन-जिन कामों-कामनाओं का उच्चारण करता है, उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है।

अनेन गणपतिमभिषिंचति
स वाग्मी भवति
चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति
स विद्यावान भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्
न बिभेति कदाचनेति ।।१४।।

इसके द्वारा जो गणपति को स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है। जो चतुर्थी तिथि को उपवास करके जपता है वह विद्यावान हो जाता है, यह अथर्व वाक्य है जो इस मं‍त्र के द्वारा तपश्चरण करना जानता है वह कदापि भय को प्राप्त नहीं होता।

यो दूर्वांकुरैंर्यजति
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति
स मेधावान भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छित फलमवाप्रोति।
य: साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते ।।१५।।

जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का यजन करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। जो लाजो (धानी-लाई) के द्वारा यजन करता है वह यशस्वी होता है, मेधावी होता है। जो सहस्र (हजार) लड्डुओं (मोदकों) द्वारा यजन करता है, वह वांछित फल को प्राप्त करता है। जो घृत के सहित समिधा से यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है।

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्‍ ।।१६।।

आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से ग्राह कराने पर सूर्य के समान तेजस्वी होता है। सूर्य ग्रहण में महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र सिद्धि होती है। वह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है वह सर्वज्ञ हो जाता है।
।।    अथर्ववेदीय गणपतिउपनिषद समाप्त    ।।


।।    श्री गणपति अथर्वशीर्ष    ।।

ॐ नमस्ते गणपतये।

त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।।
ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।।
अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्।।3।।
त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽसि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि।।4।।
सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिवाक्पदानि।।5।।
त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।
गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सं हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:।।7।।
एकदंताय विद्‍महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।।
एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।।
नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।।
एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।
स सर्वत: सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।।11।।
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।।12।।
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।13।।
अनेन गणपतिमभिषिंचति
स वाग्मी भवति
चतुर्थ्यामनश्र्नन जपतिl
स विद्यावान भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्
न बिभेति कदाचनेति।।14।।
यो दूर्वांकुरैंर्यजति
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति
स मेधावान भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छित फलमवाप्रोति।
य: साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।।16।।

अथर्ववेदीय गणपतिउपनिषद समाप्त।।

Wednesday, September 12, 2018

SRI MAHA GANAPATI SAHASRANAMA STOTRAM गणेशसहस्रनामस्तोत्रं

गणेशसहस्रनामस्तोत्रं

मुनिरुवाच
कथं नाम्नां सहस्रं तं गणेश उपदिष्टवान् ।
शिवदं तन्ममाचक्ष्व लोकानुग्रहतत्पर ॥ 1 ॥

ब्रह्मोवाच
देवः पूर्वं पुरारातिः पुरत्रयजयोद्यमे ।
अनर्चनाद्गणेशस्य जातो विघ्नाकुलः किल ॥ 2 ॥

मनसा स विनिर्धार्य ददृशे विघ्नकारणम् ।
महागणपतिं भक्त्या समभ्यर्च्य यथाविधि ॥ 3 ॥

विघ्नप्रशमनोपायमपृच्छदपरिश्रमम् ।
सन्तुष्टः पूजया शम्भोर्महागणपतिः स्वयम् ॥ 4 ॥

सर्वविघ्नप्रशमनं सर्वकामफलप्रदम् ।
ततस्तस्मै स्वयं नाम्नां सहस्रमिदमब्रवीत् ॥ 5 ॥

अस्य श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रमालामन्त्रस्य ।
गणेश ऋषिः, महागणपतिर्देवता, नानाविधानिच्छन्दांसि ।
हुमिति बीजम्, तुङ्गमिति शक्तिः, स्वाहाशक्तिरिति कीलकम् ।
सकलविघ्नविनाशनद्वारा श्रीमहागणपतिप्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
 Astrologer Govind

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अथ करन्यासः
गणेश्वरो गणक्रीड इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
कुमारगुरुरीशान इति तर्जनीभ्यां नमः ॥
ब्रह्माण्डकुम्भश्चिद्व्योमेति मध्यमाभ्यां नमः ।
रक्तो रक्ताम्बरधर इत्यनामिकाभ्यां नमः
सर्वसद्गुरुसंसेव्य इति कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
लुप्तविघ्नः स्वभक्तानामिति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥

अथ अङ्गन्यासः
छन्दश्छन्दोद्भव इति हृदयाय नमः ।
निष्कलो निर्मल इति शिरसे स्वाहा ।
सृष्टिस्थितिलयक्रीड इति शिखायै वषट् ।
ज्ञानं विज्ञानमानन्द इति कवचाय हुम् ।
अष्टाङ्गयोगफलभृदिति नेत्रत्रयाय वौषट् ।
अनन्तशक्तिसहित इत्यस्त्राय फट् ।
भूर्भुवः स्वरोम् इति दिग्बन्धः ।

अथ ध्यानम्
गजवदनमचिन्त्यं तीक्ष्णदंष्ट्रं त्रिनेत्रं
बृहदुदरमशेषं भूतिराजं पुराणम् ।
अमरवरसुपूज्यं रक्तवर्णं सुरेशं
पशुपतिसुतमीशं विघ्नराजं नमामि ॥

श्रीगणपतिरुवाच
ॐ गणेश्वरो गणक्रीडो गणनाथो गणाधिपः ।
एकदन्तो वक्रतुण्डो गजवक्त्रो महोदरः ॥ 1 ॥

लम्बोदरो धूम्रवर्णो विकटो विघ्ननाशनः ।
सुमुखो दुर्मुखो बुद्धो विघ्नराजो गजाननः ॥ 2 ॥

भीमः प्रमोद आमोदः सुरानन्दो मदोत्कटः ।
हेरम्बः शम्बरः शम्भुर्लम्बकर्णो महाबलः ॥ 3 ॥

नन्दनो लम्पटो भीमो मेघनादो गणञ्जयः ।
विनायको विरूपाक्षो वीरः शूरवरप्रदः ॥ 4 ॥

महागणपतिर्बुद्धिप्रियः क्षिप्रप्रसादनः ।
रुद्रप्रियो गणाध्यक्ष उमापुत्रो‌உघनाशनः ॥ 5 ॥

कुमारगुरुरीशानपुत्रो मूषकवाहनः ।
सिद्धिप्रियः सिद्धिपतिः सिद्धः सिद्धिविनायकः ॥ 6 ॥

अविघ्नस्तुम्बुरुः सिंहवाहनो मोहिनीप्रियः ।
कटङ्कटो राजपुत्रः शाकलः संमितोमितः ॥ 7 ॥

कूष्माण्डसामसम्भूतिर्दुर्जयो धूर्जयो जयः ।
भूपतिर्भुवनपतिर्भूतानां पतिरव्ययः ॥ 8 ॥

विश्वकर्ता विश्वमुखो विश्वरूपो निधिर्गुणः ।
कविः कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मवित्प्रियः ॥ 9 ॥

ज्येष्ठराजो निधिपतिर्निधिप्रियपतिप्रियः ।
हिरण्मयपुरान्तःस्थः सूर्यमण्डलमध्यगः ॥ 10 ॥

कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः पूषदन्तभित् ।
उमाङ्ककेलिकुतुकी मुक्तिदः कुलपावनः ॥ 11 ॥

किरीटी कुण्डली हारी वनमाली मनोमयः ।
वैमुख्यहतदैत्यश्रीः पादाहतिजितक्षितिः ॥ 12 ॥

सद्योजातः स्वर्णमुञ्जमेखली दुर्निमित्तहृत् ।
दुःस्वप्नहृत्प्रसहनो गुणी नादप्रतिष्ठितः ॥ 13 ॥

सुरूपः सर्वनेत्राधिवासो वीरासनाश्रयः ।
पीताम्बरः खण्डरदः खण्डवैशाखसंस्थितः ॥ 14 ॥

चित्राङ्गः श्यामदशनो भालचन्द्रो हविर्भुजः ।
योगाधिपस्तारकस्थः पुरुषो गजकर्णकः ॥ 15 ॥

गणाधिराजो विजयः स्थिरो गजपतिध्वजी ।
देवदेवः स्मरः प्राणदीपको वायुकीलकः ॥ 16 ॥

विपश्चिद्वरदो नादो नादभिन्नमहाचलः ।
वराहरदनो मृत्युञ्जयो व्याघ्राजिनाम्बरः ॥ 17 ॥

इच्छाशक्तिभवो देवत्राता दैत्यविमर्दनः ।
शम्भुवक्त्रोद्भवः शम्भुकोपहा शम्भुहास्यभूः ॥ 18 ॥

शम्भुतेजाः शिवाशोकहारी गौरीसुखावहः ।
उमाङ्गमलजो गौरीतेजोभूः स्वर्धुनीभवः ॥ 19 ॥

यज्ञकायो महानादो गिरिवर्ष्मा शुभाननः ।
सर्वात्मा सर्वदेवात्मा ब्रह्ममूर्धा ककुप्श्रुतिः ॥ 20 ॥

ब्रह्माण्डकुम्भश्चिद्व्योमभालःसत्यशिरोरुहः ।
जगज्जन्मलयोन्मेषनिमेषो‌உग्न्यर्कसोमदृक् ॥ 21 ॥

गिरीन्द्रैकरदो धर्माधर्मोष्ठः सामबृंहितः ।
ग्रहर्क्षदशनो वाणीजिह्वो वासवनासिकः ॥ 22 ॥

भ्रूमध्यसंस्थितकरो ब्रह्मविद्यामदोदकः ।
कुलाचलांसः सोमार्कघण्टो रुद्रशिरोधरः ॥ 23 ॥

नदीनदभुजः सर्पाङ्गुलीकस्तारकानखः ।
व्योमनाभिः श्रीहृदयो मेरुपृष्ठो‌உर्णवोदरः ॥ 24 ॥

कुक्षिस्थयक्षगन्धर्वरक्षःकिन्नरमानुषः ।
पृथ्वीकटिः सृष्टिलिङ्गः शैलोरुर्दस्रजानुकः ॥ 25 ॥

पातालजङ्घो मुनिपात्कालाङ्गुष्ठस्त्रयीतनुः ।
ज्योतिर्मण्डललाङ्गूलो हृदयालाननिश्चलः ॥ 26 ॥

हृत्पद्मकर्णिकाशाली वियत्केलिसरोवरः ।
सद्भक्तध्याननिगडः पूजावारिनिवारितः ॥ 27 ॥

प्रतापी काश्यपो मन्ता गणको विष्टपी बली ।
यशस्वी धार्मिको जेता प्रथमः प्रमथेश्वरः ॥ 28 ॥

चिन्तामणिर्द्वीपपतिः कल्पद्रुमवनालयः ।
रत्नमण्डपमध्यस्थो रत्नसिंहासनाश्रयः ॥ 29 ॥

तीव्राशिरोद्धृतपदो ज्वालिनीमौलिलालितः ।
नन्दानन्दितपीठश्रीर्भोगदो भूषितासनः ॥ 30 ॥

सकामदायिनीपीठः स्फुरदुग्रासनाश्रयः ।
तेजोवतीशिरोरत्नं सत्यानित्यावतंसितः ॥ 31 ॥

सविघ्ननाशिनीपीठः सर्वशक्त्यम्बुजालयः ।
लिपिपद्मासनाधारो वह्निधामत्रयालयः ॥ 32 ॥

उन्नतप्रपदो गूढगुल्फः संवृतपार्ष्णिकः ।
पीनजङ्घः श्लिष्टजानुः स्थूलोरुः प्रोन्नमत्कटिः ॥ 33 ॥

निम्ननाभिः स्थूलकुक्षिः पीनवक्षा बृहद्भुजः ।
पीनस्कन्धः कम्बुकण्ठो लम्बोष्ठो लम्बनासिकः ॥ 34 ॥

भग्नवामरदस्तुङ्गसव्यदन्तो महाहनुः ।
ह्रस्वनेत्रत्रयः शूर्पकर्णो निबिडमस्तकः ॥ 35 ॥

स्तबकाकारकुम्भाग्रो रत्नमौलिर्निरङ्कुशः ।
सर्पहारकटीसूत्रः सर्पयज्ञोपवीतवान् ॥ 36 ॥

सर्पकोटीरकटकः सर्पग्रैवेयकाङ्गदः ।
सर्पकक्षोदराबन्धः सर्पराजोत्तरच्छदः ॥ 37 ॥

रक्तो रक्ताम्बरधरो रक्तमालाविभूषणः ।
रक्तेक्षनो रक्तकरो रक्तताल्वोष्ठपल्लवः ॥ 38 ॥

श्वेतः श्वेताम्बरधरः श्वेतमालाविभूषणः ।
श्वेतातपत्ररुचिरः श्वेतचामरवीजितः ॥ 39 ॥

सर्वावयवसम्पूर्णः सर्वलक्षणलक्षितः ।
सर्वाभरणशोभाढ्यः सर्वशोभासमन्वितः ॥ 40 ॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यः सर्वकारणकारणम् ।
सर्वदेववरः शार्ङ्गी बीजपूरी गदाधरः ॥ 41 ॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
किरीटी कुण्डली हारी वनमाली शुभाङ्गदः ॥ 42 ॥

इक्षुचापधरः शूली चक्रपाणिः सरोजभृत् ।
पाशी धृतोत्पलः शालिमञ्जरीभृत्स्वदन्तभृत् ॥ 43 ॥

कल्पवल्लीधरो विश्वाभयदैककरो वशी ।
अक्षमालाधरो ज्ञानमुद्रावान् मुद्गरायुधः ॥ 44 ॥

पूर्णपात्री कम्बुधरो विधृताङ्कुशमूलकः ।
करस्थाम्रफलश्चूतकलिकाभृत्कुठारवान् ॥ 45 ॥

पुष्करस्थस्वर्णघटीपूर्णरत्नाभिवर्षकः ।
भारतीसुन्दरीनाथो विनायकरतिप्रियः ॥ 46 ॥

महालक्ष्मीप्रियतमः सिद्धलक्ष्मीमनोरमः ।
रमारमेशपूर्वाङ्गो दक्षिणोमामहेश्वरः ॥ 47 ॥

महीवराहवामाङ्गो रतिकन्दर्पपश्चिमः ।
आमोदमोदजननः सप्रमोदप्रमोदनः ॥ 48 ॥

संवर्धितमहावृद्धिरृद्धिसिद्धिप्रवर्धनः ।
दन्तसौमुख्यसुमुखः कान्तिकन्दलिताश्रयः ॥ 49 ॥

मदनावत्याश्रिताङ्घ्रिः कृतवैमुख्यदुर्मुखः ।
विघ्नसम्पल्लवः पद्मः सर्वोन्नतमदद्रवः ॥ 50 ॥

विघ्नकृन्निम्नचरणो द्राविणीशक्तिसत्कृतः ।
तीव्राप्रसन्ननयनो ज्वालिनीपालितैकदृक् ॥ 51 ॥

मोहिनीमोहनो भोगदायिनीकान्तिमण्डनः ।
कामिनीकान्तवक्त्रश्रीरधिष्ठितवसुन्धरः ॥ 52 ॥

वसुधारामदोन्नादो महाशङ्खनिधिप्रियः ।
नमद्वसुमतीमाली महापद्मनिधिः प्रभुः ॥ 53 ॥

सर्वसद्गुरुसंसेव्यः शोचिष्केशहृदाश्रयः ।
ईशानमूर्धा देवेन्द्रशिखः पवननन्दनः ॥ 54 ॥

प्रत्युग्रनयनो दिव्यो दिव्यास्त्रशतपर्वधृक् ।
ऐरावतादिसर्वाशावारणो वारणप्रियः ॥ 55 ॥

वज्राद्यस्त्रपरीवारो गणचण्डसमाश्रयः ।
जयाजयपरिकरो विजयाविजयावहः ॥ 56 ॥

अजयार्चितपादाब्जो नित्यानन्दवनस्थितः ।
विलासिनीकृतोल्लासः शौण्डी सौन्दर्यमण्डितः ॥ 57 ॥

अनन्तानन्तसुखदः सुमङ्गलसुमङ्गलः ।
ज्ञानाश्रयः क्रियाधार इच्छाशक्तिनिषेवितः ॥ 58 ॥

सुभगासंश्रितपदो ललिताललिताश्रयः ।
कामिनीपालनः कामकामिनीकेलिलालितः ॥ 59 ॥

सरस्वत्याश्रयो गौरीनन्दनः श्रीनिकेतनः ।
गुरुगुप्तपदो वाचासिद्धो वागीश्वरीपतिः ॥ 60 ॥

नलिनीकामुको वामारामो ज्येष्ठामनोरमः ।
रौद्रीमुद्रितपादाब्जो हुम्बीजस्तुङ्गशक्तिकः ॥ 61 ॥

विश्वादिजननत्राणः स्वाहाशक्तिः सकीलकः ।
अमृताब्धिकृतावासो मदघूर्णितलोचनः ॥ 62 ॥

उच्छिष्टोच्छिष्टगणको गणेशो गणनायकः ।
सार्वकालिकसंसिद्धिर्नित्यसेव्यो दिगम्बरः ॥ 63 ॥

अनपायो‌உनन्तदृष्टिरप्रमेयो‌உजरामरः ।
अनाविलो‌உप्रतिहतिरच्युतो‌உमृतमक्षरः ॥ 64 ॥

अप्रतर्क्यो‌உक्षयो‌உजय्यो‌உनाधारो‌உनामयोमलः ।
अमेयसिद्धिरद्वैतमघोरो‌உग्निसमाननः ॥ 65 ॥

अनाकारो‌உब्धिभूम्यग्निबलघ्नो‌உव्यक्तलक्षणः ।
आधारपीठमाधार आधाराधेयवर्जितः ॥ 66 ॥

आखुकेतन आशापूरक आखुमहारथः ।
इक्षुसागरमध्यस्थ इक्षुभक्षणलालसः ॥ 67 ॥

इक्षुचापातिरेकश्रीरिक्षुचापनिषेवितः ।
इन्द्रगोपसमानश्रीरिन्द्रनीलसमद्युतिः ॥ 68 ॥

इन्दीवरदलश्याम इन्दुमण्डलमण्डितः ।
इध्मप्रिय इडाभाग इडावानिन्दिराप्रियः ॥ 69 ॥

इक्ष्वाकुविघ्नविध्वंसी इतिकर्तव्यतेप्सितः ।
ईशानमौलिरीशान ईशानप्रिय ईतिहा ॥ 70 ॥

ईषणात्रयकल्पान्त ईहामात्रविवर्जितः ।
उपेन्द्र उडुभृन्मौलिरुडुनाथकरप्रियः ॥ 71 ॥

उन्नतानन उत्तुङ्ग उदारस्त्रिदशाग्रणीः ।
ऊर्जस्वानूष्मलमद ऊहापोहदुरासदः ॥ 72 ॥

ऋग्यजुःसामनयन ऋद्धिसिद्धिसमर्पकः ।
ऋजुचित्तैकसुलभो ऋणत्रयविमोचनः ॥ 73 ॥

लुप्तविघ्नः स्वभक्तानां लुप्तशक्तिः सुरद्विषाम् ।
लुप्तश्रीर्विमुखार्चानां लूताविस्फोटनाशनः ॥ 74 ॥

एकारपीठमध्यस्थ एकपादकृतासनः ।
एजिताखिलदैत्यश्रीरेधिताखिलसंश्रयः ॥ 75 ॥

ऐश्वर्यनिधिरैश्वर्यमैहिकामुष्मिकप्रदः ।
ऐरंमदसमोन्मेष ऐरावतसमाननः ॥ 76 ॥

ओङ्कारवाच्य ॐकार ओजस्वानोषधीपतिः ।
औदार्यनिधिरौद्धत्यधैर्य औन्नत्यनिःसमः ॥ 77 ॥

अङ्कुशः सुरनागानामङ्कुशाकारसंस्थितः ।
अः समस्तविसर्गान्तपदेषु परिकीर्तितः ॥ 78 ॥

कमण्डलुधरः कल्पः कपर्दी कलभाननः ।
कर्मसाक्षी कर्मकर्ता कर्माकर्मफलप्रदः ॥ 79 ॥

कदम्बगोलकाकारः कूष्माण्डगणनायकः ।
कारुण्यदेहः कपिलः कथकः कटिसूत्रभृत् ॥ 80 ॥

खर्वः खड्गप्रियः खड्गः खान्तान्तःस्थः खनिर्मलः ।
खल्वाटशृङ्गनिलयः खट्वाङ्गी खदुरासदः ॥ 81 ॥

गुणाढ्यो गहनो गद्यो गद्यपद्यसुधार्णवः ।
गद्यगानप्रियो गर्जो गीतगीर्वाणपूर्वजः ॥ 82 ॥

गुह्याचाररतो गुह्यो गुह्यागमनिरूपितः ।
गुहाशयो गुडाब्धिस्थो गुरुगम्यो गुरुर्गुरुः ॥ 83 ॥

घण्टाघर्घरिकामाली घटकुम्भो घटोदरः ।
ङकारवाच्यो ङाकारो ङकाराकारशुण्डभृत् ॥ 84 ॥

चण्डश्चण्डेश्वरश्चण्डी चण्डेशश्चण्डविक्रमः ।
चराचरपिता चिन्तामणिश्चर्वणलालसः ॥ 85 ॥

छन्दश्छन्दोद्भवश्छन्दो दुर्लक्ष्यश्छन्दविग्रहः ।
जगद्योनिर्जगत्साक्षी जगदीशो जगन्मयः ॥ 86 ॥

जप्यो जपपरो जाप्यो जिह्वासिंहासनप्रभुः ।
स्रवद्गण्डोल्लसद्धानझङ्कारिभ्रमराकुलः ॥ 87 ॥

टङ्कारस्फारसंरावष्टङ्कारमणिनूपुरः ।
ठद्वयीपल्लवान्तस्थसर्वमन्त्रेषु सिद्धिदः ॥ 88 ॥

डिण्डिमुण्डो डाकिनीशो डामरो डिण्डिमप्रियः ।
ढक्कानिनादमुदितो ढौङ्को ढुण्ढिविनायकः ॥ 89 ॥

तत्त्वानां प्रकृतिस्तत्त्वं तत्त्वम्पदनिरूपितः ।
तारकान्तरसंस्थानस्तारकस्तारकान्तकः ॥ 90 ॥

स्थाणुः स्थाणुप्रियः स्थाता स्थावरं जङ्गमं जगत् ।
दक्षयज्ञप्रमथनो दाता दानं दमो दया ॥ 91 ॥

दयावान्दिव्यविभवो दण्डभृद्दण्डनायकः ।
दन्तप्रभिन्नाभ्रमालो दैत्यवारणदारणः ॥ 92 ॥

दंष्ट्रालग्नद्वीपघटो देवार्थनृगजाकृतिः ।
धनं धनपतेर्बन्धुर्धनदो धरणीधरः ॥ 93 ॥

ध्यानैकप्रकटो ध्येयो ध्यानं ध्यानपरायणः ।
ध्वनिप्रकृतिचीत्कारो ब्रह्माण्डावलिमेखलः ॥ 94 ॥

नन्द्यो नन्दिप्रियो नादो नादमध्यप्रतिष्ठितः ।
निष्कलो निर्मलो नित्यो नित्यानित्यो निरामयः ॥ 95 ॥

परं व्योम परं धाम परमात्मा परं पदम् ॥ 96 ॥

परात्परः पशुपतिः पशुपाशविमोचनः ।
पूर्णानन्दः परानन्दः पुराणपुरुषोत्तमः ॥ 97 ॥

पद्मप्रसन्नवदनः प्रणताज्ञाननाशनः ।
प्रमाणप्रत्ययातीतः प्रणतार्तिनिवारणः ॥ 98 ॥

फणिहस्तः फणिपतिः फूत्कारः फणितप्रियः ।
बाणार्चिताङ्घ्रियुगलो बालकेलिकुतूहली ।
ब्रह्म ब्रह्मार्चितपदो ब्रह्मचारी बृहस्पतिः ॥ 99 ॥

बृहत्तमो ब्रह्मपरो ब्रह्मण्यो ब्रह्मवित्प्रियः ।
बृहन्नादाग्र्यचीत्कारो ब्रह्माण्डावलिमेखलः ॥ 100 ॥

भ्रूक्षेपदत्तलक्ष्मीको भर्गो भद्रो भयापहः ।
भगवान् भक्तिसुलभो भूतिदो भूतिभूषणः ॥ 101 ॥

भव्यो भूतालयो भोगदाता भ्रूमध्यगोचरः ।
मन्त्रो मन्त्रपतिर्मन्त्री मदमत्तो मनो मयः ॥ 102 ॥

मेखलाहीश्वरो मन्दगतिर्मन्दनिभेक्षणः ।
महाबलो महावीर्यो महाप्राणो महामनाः ॥ 103 ॥

यज्ञो यज्ञपतिर्यज्ञगोप्ता यज्ञफलप्रदः ।
यशस्करो योगगम्यो याज्ञिको याजकप्रियः ॥ 104 ॥

रसो रसप्रियो रस्यो रञ्जको रावणार्चितः ।
राज्यरक्षाकरो रत्नगर्भो राज्यसुखप्रदः ॥ 105 ॥

लक्षो लक्षपतिर्लक्ष्यो लयस्थो लड्डुकप्रियः ।
लासप्रियो लास्यपरो लाभकृल्लोकविश्रुतः ॥ 106 ॥

वरेण्यो वह्निवदनो वन्द्यो वेदान्तगोचरः ।
विकर्ता विश्वतश्चक्षुर्विधाता विश्वतोमुखः ॥ 107 ॥

वामदेवो विश्वनेता वज्रिवज्रनिवारणः ।
विवस्वद्बन्धनो विश्वाधारो विश्वेश्वरो विभुः ॥ 108 ॥

शब्दब्रह्म शमप्राप्यः शम्भुशक्तिगणेश्वरः ।
शास्ता शिखाग्रनिलयः शरण्यः शम्बरेश्वरः ॥ 109 ॥

षडृतुकुसुमस्रग्वी षडाधारः षडक्षरः ।
संसारवैद्यः सर्वज्ञः सर्वभेषजभेषजम् ॥ 110 ॥

सृष्टिस्थितिलयक्रीडः सुरकुञ्जरभेदकः ।
सिन्दूरितमहाकुम्भः सदसद्भक्तिदायकः ॥ 111 ॥

साक्षी समुद्रमथनः स्वयंवेद्यः स्वदक्षिणः ।
स्वतन्त्रः सत्यसङ्कल्पः सामगानरतः सुखी ॥ 112 ॥

हंसो हस्तिपिशाचीशो हवनं हव्यकव्यभुक् ।
हव्यं हुतप्रियो हृष्टो हृल्लेखामन्त्रमध्यगः ॥ 113 ॥

क्षेत्राधिपः क्षमाभर्ता क्षमाक्षमपरायणः ।
क्षिप्रक्षेमकरः क्षेमानन्दः क्षोणीसुरद्रुमः ॥ 114 ॥

धर्मप्रदो‌உर्थदः कामदाता सौभाग्यवर्धनः ।
विद्याप्रदो विभवदो भुक्तिमुक्तिफलप्रदः ॥ 115 ॥

आभिरूप्यकरो वीरश्रीप्रदो विजयप्रदः ।
सर्ववश्यकरो गर्भदोषहा पुत्रपौत्रदः ॥ 116 ॥

मेधादः कीर्तिदः शोकहारी दौर्भाग्यनाशनः ।
प्रतिवादिमुखस्तम्भो रुष्टचित्तप्रसादनः ॥ 117 ॥

पराभिचारशमनो दुःखहा बन्धमोक्षदः ।
लवस्त्रुटिः कला काष्ठा निमेषस्तत्परक्षणः ॥ 118 ॥

घटी मुहूर्तः प्रहरो दिवा नक्तमहर्निशम् ।
पक्षो मासर्त्वयनाब्दयुगं कल्पो महालयः ॥ 119 ॥

राशिस्तारा तिथिर्योगो वारः करणमंशकम् ।
लग्नं होरा कालचक्रं मेरुः सप्तर्षयो ध्रुवः ॥ 120 ॥

राहुर्मन्दः कविर्जीवो बुधो भौमः शशी रविः ।
कालः सृष्टिः स्थितिर्विश्वं स्थावरं जङ्गमं जगत् ॥ 121 ॥

भूरापो‌உग्निर्मरुद्व्योमाहङ्कृतिः प्रकृतिः पुमान् ।
ब्रह्मा विष्णुः शिवो रुद्र ईशः शक्तिः सदाशिवः ॥ 122 ॥

त्रिदशाः पितरः सिद्धा यक्षा रक्षांसि किन्नराः ।
सिद्धविद्याधरा भूता मनुष्याः पशवः खगाः ॥ 123 ॥

समुद्राः सरितः शैला भूतं भव्यं भवोद्भवः ।
साङ्ख्यं पातञ्जलं योगं पुराणानि श्रुतिः स्मृतिः ॥ 124 ॥

वेदाङ्गानि सदाचारो मीमांसा न्यायविस्तरः ।
आयुर्वेदो धनुर्वेदो गान्धर्वं काव्यनाटकम् ॥ 125 ॥

वैखानसं भागवतं मानुषं पाञ्चरात्रकम् ।
शैवं पाशुपतं कालामुखम्भैरवशासनम् ॥ 126 ॥

शाक्तं वैनायकं सौरं जैनमार्हतसंहिता ।
सदसद्व्यक्तमव्यक्तं सचेतनमचेतनम् ॥ 127 ॥

बन्धो मोक्षः सुखं भोगो योगः सत्यमणुर्महान् ।
स्वस्ति हुम्फट् स्वधा स्वाहा श्रौषट् वौषट् वषण् नमः 128 ॥

ज्ञानं विज्ञानमानन्दो बोधः संवित्समो‌உसमः ।
एक एकाक्षराधार एकाक्षरपरायणः ॥ 129 ॥

एकाग्रधीरेकवीर एको‌உनेकस्वरूपधृक् ।
द्विरूपो द्विभुजो द्व्यक्षो द्विरदो द्वीपरक्षकः ॥ 130 ॥

द्वैमातुरो द्विवदनो द्वन्द्वहीनो द्वयातिगः ।
त्रिधामा त्रिकरस्त्रेता त्रिवर्गफलदायकः ॥ 131 ॥

त्रिगुणात्मा त्रिलोकादिस्त्रिशक्तीशस्त्रिलोचनः ।
चतुर्विधवचोवृत्तिपरिवृत्तिप्रवर्तकः ॥ 132 ॥

चतुर्बाहुश्चतुर्दन्तश्चतुरात्मा चतुर्भुजः ।
चतुर्विधोपायमयश्चतुर्वर्णाश्रमाश्रयः 133 ॥

चतुर्थीपूजनप्रीतश्चतुर्थीतिथिसम्भवः ॥
पञ्चाक्षरात्मा पञ्चात्मा पञ्चास्यः पञ्चकृत्तमः ॥ 134 ॥

पञ्चाधारः पञ्चवर्णः पञ्चाक्षरपरायणः ।
पञ्चतालः पञ्चकरः पञ्चप्रणवमातृकः ॥ 135 ॥

पञ्चब्रह्ममयस्फूर्तिः पञ्चावरणवारितः ।
पञ्चभक्षप्रियः पञ्चबाणः पञ्चशिखात्मकः ॥ 136 ॥

षट्कोणपीठः षट्चक्रधामा षड्ग्रन्थिभेदकः ।
षडङ्गध्वान्तविध्वंसी षडङ्गुलमहाह्रदः ॥ 137 ॥

षण्मुखः षण्मुखभ्राता षट्शक्तिपरिवारितः ।
षड्वैरिवर्गविध्वंसी षडूर्मिभयभञ्जनः ॥ 138 ॥

षट्तर्कदूरः षट्कर्मा षड्गुणः षड्रसाश्रयः ।
सप्तपातालचरणः सप्तद्वीपोरुमण्डलः ॥ 139 ॥

सप्तस्वर्लोकमुकुटः सप्तसप्तिवरप्रदः ।
सप्ताङ्गराज्यसुखदः सप्तर्षिगणवन्दितः ॥ 140 ॥

सप्तच्छन्दोनिधिः सप्तहोत्रः सप्तस्वराश्रयः ।
सप्ताब्धिकेलिकासारः सप्तमातृनिषेवितः ॥ 141 ॥

सप्तच्छन्दो मोदमदः सप्तच्छन्दो मखप्रभुः ।
अष्टमूर्तिर्ध्येयमूर्तिरष्टप्रकृतिकारणम् ॥ 142 ॥

अष्टाङ्गयोगफलभृदष्टपत्राम्बुजासनः ।
अष्टशक्तिसमानश्रीरष्टैश्वर्यप्रवर्धनः ॥ 143 ॥

अष्टपीठोपपीठश्रीरष्टमातृसमावृतः ।
अष्टभैरवसेव्यो‌உष्टवसुवन्द्यो‌உष्टमूर्तिभृत् ॥ 144 ॥

अष्टचक्रस्फुरन्मूर्तिरष्टद्रव्यहविःप्रियः ।
अष्टश्रीरष्टसामश्रीरष्टैश्वर्यप्रदायकः ।
नवनागासनाध्यासी नवनिध्यनुशासितः ॥ 145 ॥

नवद्वारपुरावृत्तो नवद्वारनिकेतनः ।
नवनाथमहानाथो नवनागविभूषितः ॥ 146 ॥

नवनारायणस्तुल्यो नवदुर्गानिषेवितः ।
नवरत्नविचित्राङ्गो नवशक्तिशिरोद्धृतः ॥ 147 ॥

दशात्मको दशभुजो दशदिक्पतिवन्दितः ।
दशाध्यायो दशप्राणो दशेन्द्रियनियामकः ॥ 148 ॥

दशाक्षरमहामन्त्रो दशाशाव्यापिविग्रहः ।
एकादशमहारुद्रैःस्तुतश्चैकादशाक्षरः ॥ 149 ॥

द्वादशद्विदशाष्टादिदोर्दण्डास्त्रनिकेतनः ।
त्रयोदशभिदाभिन्नो विश्वेदेवाधिदैवतम् ॥ 150 ॥

चतुर्दशेन्द्रवरदश्चतुर्दशमनुप्रभुः ।
चतुर्दशाद्यविद्याढ्यश्चतुर्दशजगत्पतिः ॥ 151 ॥

सामपञ्चदशः पञ्चदशीशीतांशुनिर्मलः ।
तिथिपञ्चदशाकारस्तिथ्या पञ्चदशार्चितः ॥ 152 ॥

षोडशाधारनिलयः षोडशस्वरमातृकः ।
षोडशान्तपदावासः षोडशेन्दुकलात्मकः ॥ 153 ॥

कलासप्तदशी सप्तदशसप्तदशाक्षरः ।
अष्टादशद्वीपपतिरष्टादशपुराणकृत् ॥ 154 ॥

अष्टादशौषधीसृष्टिरष्टादशविधिः स्मृतः ।
अष्टादशलिपिव्यष्टिसमष्टिज्ञानकोविदः ॥ 155 ॥

अष्टादशान्नसम्पत्तिरष्टादशविजातिकृत् ।
एकविंशः पुमानेकविंशत्यङ्गुलिपल्लवः ॥ 156 ॥

चतुर्विंशतितत्त्वात्मा पञ्चविंशाख्यपूरुषः ।
सप्तविंशतितारेशः सप्तविंशतियोगकृत् ॥ 157 ॥

द्वात्रिंशद्भैरवाधीशश्चतुस्त्रिंशन्महाह्रदः ।
षट्त्रिंशत्तत्त्वसम्भूतिरष्टत्रिंशत्कलात्मकः ॥ 158 ॥

पञ्चाशद्विष्णुशक्तीशः पञ्चाशन्मातृकालयः ।
द्विपञ्चाशद्वपुःश्रेणीत्रिषष्ट्यक्षरसंश्रयः ।
पञ्चाशदक्षरश्रेणीपञ्चाशद्रुद्रविग्रहः ॥ 159 ॥

चतुःषष्टिमहासिद्धियोगिनीवृन्दवन्दितः ।
नमदेकोनपञ्चाशन्मरुद्वर्गनिरर्गलः ॥ 160 ॥

चतुःषष्ट्यर्थनिर्णेता चतुःषष्टिकलानिधिः ।
अष्टषष्टिमहातीर्थक्षेत्रभैरववन्दितः ॥ 161 ॥

चतुर्नवतिमन्त्रात्मा षण्णवत्यधिकप्रभुः ।
शतानन्दः शतधृतिः शतपत्रायतेक्षणः ॥ 162 ॥

शतानीकः शतमखः शतधारावरायुधः ।
सहस्रपत्रनिलयः सहस्रफणिभूषणः ॥ 163 ॥

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।
सहस्रनामसंस्तुत्यः सहस्राक्षबलापहः ॥ 164 ॥

दशसाहस्रफणिभृत्फणिराजकृतासनः ।
अष्टाशीतिसहस्राद्यमहर्षिस्तोत्रपाठितः ॥ 165 ॥

लक्षाधारः प्रियाधारो लक्षाधारमनोमयः ।
चतुर्लक्षजपप्रीतश्चतुर्लक्षप्रकाशकः ॥ 166 ॥

चतुरशीतिलक्षाणां जीवानां देहसंस्थितः ।
कोटिसूर्यप्रतीकाशः कोटिचन्द्रांशुनिर्मलः ॥ 167 ॥

शिवोद्भवाद्यष्टकोटिवैनायकधुरन्धरः ।
सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवद्युतिः ॥ 168 ॥

त्रयस्त्रिंशत्कोटिसुरश्रेणीप्रणतपादुकः ।
अनन्तदेवतासेव्यो ह्यनन्तशुभदायकः ॥ 169 ॥

अनन्तनामानन्तश्रीरनन्तो‌உनन्तसौख्यदः ।
अनन्तशक्तिसहितो ह्यनन्तमुनिसंस्तुतः ॥ 170 ॥

इति वैनायकं नाम्नां सहस्रमिदमीरितम् ।
इदं ब्राह्मे मुहूर्ते यः पठति प्रत्यहं नरः ॥ 171 ॥

करस्थं तस्य सकलमैहिकामुष्मिकं सुखम् ।
आयुरारोग्यमैश्वर्यं धैर्यं शौर्यं बलं यशः ॥ 172 ॥

मेधा प्रज्ञा धृतिः कान्तिः सौभाग्यमभिरूपता ।
सत्यं दया क्षमा शान्तिर्दाक्षिण्यं धर्मशीलता ॥ 173 ॥

जगत्संवननं विश्वसंवादो वेदपाटवम् ।
सभापाण्डित्यमौदार्यं गाम्भीर्यं ब्रह्मवर्चसम् ॥ 174 ॥

ओजस्तेजः कुलं शीलं प्रतापो वीर्यमार्यता ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं स्थैर्यं विश्वासता तथा ॥ 175 ॥

धनधान्यादिवृद्धिश्च सकृदस्य जपाद्भवेत् ।
वश्यं चतुर्विधं विश्वं जपादस्य प्रजायते ॥ 176 ॥

राज्ञो राजकलत्रस्य राजपुत्रस्य मन्त्रिणः ।
जप्यते यस्य वश्यार्थे स दासस्तस्य जायते ॥ 177 ॥

धर्मार्थकाममोक्षाणामनायासेन साधनम् ।
शाकिनीडाकिनीरक्षोयक्षग्रहभयापहम् ॥ 178 ॥

साम्राज्यसुखदं सर्वसपत्नमदमर्दनम् ।
समस्तकलहध्वंसि दग्धबीजप्ररोहणम् ॥ 179 ॥

दुःस्वप्नशमनं क्रुद्धस्वामिचित्तप्रसादनम् ।
षड्वर्गाष्टमहासिद्धित्रिकालज्ञानकारणम् ॥ 180 ॥

परकृत्यप्रशमनं परचक्रप्रमर्दनम् ।
सङ्ग्राममार्गे सवेषामिदमेकं जयावहम् ॥ 181 ॥

सर्ववन्ध्यत्वदोषघ्नं गर्भरक्षैककारणम् ।
पठ्यते प्रत्यहं यत्र स्तोत्रं गणपतेरिदम् ॥ 182 ॥

देशे तत्र न दुर्भिक्षमीतयो दुरितानि च ।
न तद्गेहं जहाति श्रीर्यत्रायं जप्यते स्तवः ॥ 183 ॥

क्षयकुष्ठप्रमेहार्शभगन्दरविषूचिकाः ।
गुल्मं प्लीहानमशमानमतिसारं महोदरम् ॥ 184 ॥

कासं श्वासमुदावर्तं शूलं शोफामयोदरम् ।
शिरोरोगं वमिं हिक्कां गण्डमालामरोचकम् ॥ 185 ॥

वातपित्तकफद्वन्द्वत्रिदोषजनितज्वरम् ।
आगन्तुविषमं शीतमुष्णं चैकाहिकादिकम् ॥ 186 ॥

इत्याद्युक्तमनुक्तं वा रोगदोषादिसम्भवम् ।
सर्वं प्रशमयत्याशु स्तोत्रस्यास्य सकृज्जपः ॥ 187 ॥

प्राप्यते‌உस्य जपात्सिद्धिः स्त्रीशूद्रैः पतितैरपि ।
सहस्रनाममन्त्रो‌உयं जपितव्यः शुभाप्तये ॥ 188 ॥

महागणपतेः स्तोत्रं सकामः प्रजपन्निदम् ।
इच्छया सकलान् भोगानुपभुज्येह पार्थिवान् ॥ 189 ॥

मनोरथफलैर्दिव्यैर्व्योमयानैर्मनोरमैः ।
चन्द्रेन्द्रभास्करोपेन्द्रब्रह्मशर्वादिसद्मसु ॥ 190 ॥

कामरूपः कामगतिः कामदः कामदेश्वरः ।
भुक्त्वा यथेप्सितान्भोगानभीष्टैः सह बन्धुभिः ॥ 191 ॥

गणेशानुचरो भूत्वा गणो गणपतिप्रियः ।
नन्दीश्वरादिसानन्दैर्नन्दितः सकलैर्गणैः ॥ 192 ॥

शिवाभ्यां कृपया पुत्रनिर्विशेषं च लालितः ।
शिवभक्तः पूर्णकामो गणेश्वरवरात्पुनः ॥ 193 ॥

जातिस्मरो धर्मपरः सार्वभौमो‌உभिजायते ।
निष्कामस्तु जपन्नित्यं भक्त्या विघ्नेशतत्परः ॥ 194 ॥

योगसिद्धिं परां प्राप्य ज्ञानवैराग्यसंयुतः ।
निरन्तरे निराबाधे परमानन्दसञ्ज्ञिते ॥ 195 ॥

विश्वोत्तीर्णे परे पूर्णे पुनरावृत्तिवर्जिते ।
लीनो वैनायके धाम्नि रमते नित्यनिर्वृते ॥ 196 ॥

यो नामभिर्हुतैर्दत्तैः पूजयेदर्चये‌एन्नरः ।
राजानो वश्यतां यान्ति रिपवो यान्ति दासताम् ॥ 197 ॥

तस्य सिध्यन्ति मन्त्राणां दुर्लभाश्चेष्टसिद्धयः ।
मूलमन्त्रादपि स्तोत्रमिदं प्रियतमं मम ॥ 198 ॥

नभस्ये मासि शुक्लायां चतुर्थ्यां मम जन्मनि ।
दूर्वाभिर्नामभिः पूजां तर्पणं विधिवच्चरेत् ॥ 199 ॥

अष्टद्रव्यैर्विशेषेण कुर्याद्भक्तिसुसंयुतः ।
तस्येप्सितं धनं धान्यमैश्वर्यं विजयो यशः ॥ 200 ॥

भविष्यति न सन्देहः पुत्रपौत्रादिकं सुखम् ।
इदं प्रजपितं स्तोत्रं पठितं श्रावितं श्रुतम् ॥ 201 ॥

व्याकृतं चर्चितं ध्यातं विमृष्टमभिवन्दितम् ।
इहामुत्र च विश्वेषां विश्वैश्वर्यप्रदायकम् ॥ 202 ॥

स्वच्छन्दचारिणाप्येष येन सन्धार्यते स्तवः ।
स रक्ष्यते शिवोद्भूतैर्गणैरध्यष्टकोटिभिः ॥ 203 ॥

लिखितं पुस्तकस्तोत्रं मन्त्रभूतं प्रपूजयेत् ।
तत्र सर्वोत्तमा लक्ष्मीः सन्निधत्ते निरन्तरम् ॥ 204 ॥

दानैरशेषैरखिलैर्व्रतैश्च तीर्थैरशेषैरखिलैर्मखैश्च ।
न तत्फलं विन्दति यद्गणेशसहस्रनामस्मरणेन सद्यः ॥ 205 ॥

एतन्नाम्नां सहस्रं पठति दिनमणौ प्रत्यहम्प्रोज्जिहाने
सायं मध्यन्दिने वा त्रिषवणमथवा सन्ततं वा जनो यः ।
स स्यादैश्वर्यधुर्यः प्रभवति वचसां कीर्तिमुच्चैस्तनोति
दारिद्र्यं हन्ति विश्वं वशयति सुचिरं वर्धते पुत्रपौत्रैः ॥ 206 ॥

अकिञ्चनोप्येकचित्तो नियतो नियतासनः ।
प्रजपंश्चतुरो मासान् गणेशार्चनतत्परः ॥ 207 ॥

दरिद्रतां समुन्मूल्य सप्तजन्मानुगामपि ।
लभते महतीं लक्ष्मीमित्याज्ञा पारमेश्वरी ॥ 208 ॥

आयुष्यं वीतरोगं कुलमतिविमलं सम्पदश्चार्तिनाशः
कीर्तिर्नित्यावदाता भवति खलु नवा कान्तिरव्याजभव्या ।
पुत्राः सन्तः कलत्रं गुणवदभिमतं यद्यदन्यच्च तत्त –
न्नित्यं यः स्तोत्रमेतत् पठति गणपतेस्तस्य हस्ते समस्तम् ॥ 209 ॥

गणञ्जयो गणपतिर्हेरम्बो धरणीधरः ।
महागणपतिर्बुद्धिप्रियः क्षिप्रप्रसादनः ॥ 210 ॥

अमोघसिद्धिरमृतमन्त्रश्चिन्तामणिर्निधिः ।
सुमङ्गलो बीजमाशापूरको वरदः कलः ॥ 211 ॥

काश्यपो नन्दनो वाचासिद्धो ढुण्ढिर्विनायकः ।
मोदकैरेभिरत्रैकविंशत्या नामभिः पुमान् ॥ 212 ॥

उपायनं ददेद्भक्त्या मत्प्रसादं चिकीर्षति ।
वत्सरं विघ्नराजो‌உस्य तथ्यमिष्टार्थसिद्धये ॥ 213 ॥

यः स्तौति मद्गतमना ममाराधनतत्परः ।
स्तुतो नाम्ना सहस्रेण तेनाहं नात्र संशयः ॥ 214 ॥

नमो नमः सुरवरपूजिताङ्घ्रये
नमो नमो निरुपममङ्गलात्मने ।
नमो नमो विपुलदयैकसिद्धये
नमो नमः करिकलभाननाय ते ॥ 215 ॥

किङ्किणीगणरचितचरणः
प्रकटितगुरुमितचारुकरणः ।
मदजललहरीकलितकपोलः
शमयतु दुरितं गणपतिनाम्ना ॥ 216 ॥

॥ इति श्रीगणेशपुराणे उपासनाखण्डे ईश्वरगणेशसंवादे
गणेशसहस्रनामस्तोत्रं नाम षट्चत्वारिंशोध्यायः ॥